हम को लगा था हुस्न के बीमार हो गए

सच पूछिए तो इश्क़ में बे-कार हो गए

हम रहनुमा थे हम से ही राहों में थी चमक
हम कैसे तेरी राह की दीवार हो गए

माज़ी की लग़्ज़िशें भी थी दिल भी था तार तार
अपना ही ग़म निचोड़ के फ़नकार हो गए

कितनी शिकायतें थी मगर हाए ये नसीब
आख़िर को तुम ही मेरे ख़रीदार हो गए

हम शान हैं किसी की किसी का श्रृंगार हैं
हम ओढ़नी कहीं कहीं दस्तार हो गए

दिल भी ये कैसे कैसे मनाज़िर का नाम है
इक पल में आश्ना से जफ़ा-कार हो गए

हम गाँव से निकल के यहाँ आ गए मगर
इतनी सहूलतों में भी दुश्वार हो गए

आँखों में नफ़रतें भी थी हाथों पे ख़ून भी
हम ने सुना है लोग वे दीं-दार हो गए

'सय्यद' की पलकें अस्ल में 'सय्यद' की क़ैद थी
जो अपने ख़्वाब-गाह में गुलज़ार हो गए

— Aves Sayyad

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