तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए

तुझ से नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए

उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए
क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए

जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में
इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए

अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से
हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए

हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी
मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए

तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी
फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए

तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया
देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए

यूँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का
मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए

कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन
शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए

क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले
क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए

— Aves Sayyad

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