रंज-ओ-अलम के कोई मसाइल नहीं रहे
जब ज़िंदगी में कोई मुमासिल नहीं रहे
जो भी किया ब-शर्त वो अंजाम तक किया
मारे गए प' तीर के घाइल नहीं रहे
देखा करे रक़ीब ये हुस्न-ओ-अदा तेरी
हम तो किसी गुनाह के क़ाइल नहीं रहे
और बात उनके दिल से निकाले गए मगर
वो भी हमारे नाम से कामिल नहीं रहे
देखा है तेरे बाद इन्हें रख के हर जगह
ये दुख किसी बदन में भी शामिल नहीं रहे
अब आँख भी निकाल दी चल वो दिखा मुझे
जो ख़्वाब मेरी आँख के क़ाबिल नहीं रहे
खेंची हैं उसने कैसी ये दरिया में सरहदें
इक दूसरे के जैसे हैं पर मिल नहीं रहे
सय्यद किसी वजह से दरख़्तों से हो गए
सय्यद किसी के हुक्म से हम हिल नहीं रहे
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