आँख के पर्दे पर छाई रा'नाई हो
तुम मेरी रात में ख़्वाब बन आई हो
तेरे ही नाम से छेड़े हैं सब मुझे
हो मेरा 'इश्क़ या फिर तमाशाई हो
बुझ गए सब सितारे तुझे देख कर
छत पे जब ज़ुल्फ़ लहरा के इतराई हो
साथ तेरे रहा पर न पागल हुआ
है अगर बात ऐसी तो रुसवाई हो
मैं जिधर देखूँ तुम ही नज़र आती हो
मुझ पे तुम आसमाँ की तरह छाई हो
तू बनी नूर से, ख़ाक कबरों की मैं
अपनी किस्मत में केसे शनाशाई हो
खुशनुमा और भी तो हैं चेहरे यहाँ
तुम ही क्यूँ मेरे तन्हाँ तमन्नाई हो
तू न हो, तेरी यादें न तस्वीर हो
हो अगर तो मुसलसल ही तन्हाई हो
हो के बरबाद होगी मुकम्मल ग़ज़ल
फूँक कागज़ क़लम हर्फ़-आराई हो
फांके ही फांके सय्यद की किस्मत में हैं
किस घड़ी में ये तुम मुझ सेे टकराई हो
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