hawaon ki zad men likhe ja rahe hain | हवाओं की ज़द में लिखे जा रहे हैं

  - Aves Sayyad

हवाओं की ज़द में लिखे जा रहे हैं
ज़मीं चल रही है जिए जा रहे हैं

बचाए यहाँ कैसे ईमान अपना
ये कपड़े भी देखो फटे जा रहे हैं

यहाँ पहले जैसे वो जंगल कहाँ है
घरों पर से तिनके चुने जा रहे हैं

कटा जा रहा गाँव से जैसे रस्ता
उसी की तरह हम कटे जा रहे हैं

तेरे बाद अब वो दिवाली नहीं है
दिए आँख में अब चुभे जा रहे हैं

हटा जब न पाए ज़मीं पैर से तो
ज़मीं को उठा कर उड़े जा रहे हैं

वो जिसने बना कर दिवाना रखा है
उसी पर ये पागल मरे जा रहे हैं

हमारा भला अब वो हो भी तो कैसे
हमी कान उसके भरे जा रहे हैं

नुमायाँ हुए आधी रातों में सूरज
दिए आँख के सब बुझे जा रहे हैं

बहुत कुछ जहाँ में है लिखने को लेकिन
ग़ज़ल हिज्र पर ही लिखे जा रहे हैं

तेरी बज़्म में वो सुख़न अब नहीं है
इसी बात से दिल दुखे जा रहे हैं

बचा कुछ नहीं अब दिखाने को सय्यद
मगर देख फिर भी सजे जा रहे हैं

  - Aves Sayyad

Baaten Shayari

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