पेड़ों पे ताज़ा कोई ख़ामोशी लगे
कर बात फिर ऐसी जो पत्थर सी लगे
है हिज्र तो रख मातमी अंदाज़ भी
देखो उसे लहजा न शादाबी लगे
जो भी समझते है यहाँ मुझको भला
जाओ तुम्हें मेरी भली यारी लगे
अबके मुहब्बत ऐसी मुझको चाहिए
जो दर्द कम दे, हाँ मगर गहरी लगे
इक तो कोई रिश्ता नहीं रखना तुम्हें
और चाहते हो ये मेरा दिल भी लगे
मेरे फटे कपड़ो पे हँसने वाले जा
तेरे मकानों पर बड़ी जाली लगे
वो आँख में हो चाहे हो ज़ंजीर में
है क़ैद में गर तो हवालाती लगे
सय्याद को दी ये परिंदों ने दुआ
तुझको पतंग-ओ-माँझे से बिजली लगे
घर से निकलना है नहीं ख़्वाहिश मगर
कम काम हो, तनख़्वाह भी मोटी लगे
सय्यद हमारे नाम पर क्यूँ जंग हो
सय्यद गले भी हमको क्यूँ कोई लगे
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