mere kooche se tajalli ko churaate hue log | मेरे कूचे से तजल्ली को चुराते हुए लोग

  - Aves Sayyad

मेरे कूचे से तजल्ली को चुराते हुए लोग
ज़ुल्मत-ए-शब तेरी तासीर बढ़ाते हुए लोग

लिए बैठे हैं तसव्वुर में कोई गहरा निशाँ
सुर्ख़ अल्फ़ाज़ से तस्वीर बनाते हुए लोग

तेरी गलियों में अकेला ही रहा था लेकिन
अब नहीं देखते मुझको यहाँ आते हुए लोग

जिनकी क़ब्रों पे कभी फ़ातिहा पढ़ता नहीं मैं
मेरे माज़ी का वही क़िस्सा सुनाते हुए लोग

मेरे जैसों को तो बाज़ार में आने न दिया
रास्ता तेरे त'आक़ुब में सजाते हुए लोग

हाफ़िज़ा मेरा सियह रात के मानिंद हुआ
अब मुझे याद नहीं चाँद दिखाते हुए लोग

ये इमारत ये रईसी ये मुक़द्दर और बात
आ कभी देख ख़ूँ का रिज़्क़ कमाते हुए लोग

ये जो क़ातिल हैं तेरे इनकी तो चल ख़ैर नहीं
पर तेरे नाम से हंगामा उठाते हुए लोग

नींद दीवार पे लटका के रखी है 'सय्यद'
और बिस्तर पे ख़्वाबों को नचाते हुए लोग

  - Aves Sayyad

Charagh Shayari

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