गुज़रे तेरे करम से मसाइल कभी कभी
कुछ में तो तेरा नाम था शामिल कभी कभी
ये इल्तिजा है कर न तू आसान राह-ए-इश्क़
मुश्किल से मुझ पे आई है मुश्किल कभी कभी
हर बात की वज़ह हो ज़रूरी नहीं है दोस्त
ऐसे ही बैठ जाता है ये दिल कभी कभी
ख़ुद को तू अपने ज़ब्त से बाहर निकाल ले
दरिया भी खोल लेता है साहिल कभी कभी
कुछ भी नहीं है पास तो खोने का डर नहीं
फिर क्यूँ उँडेले मैं ने हलाहिल कभी कभी
उस ने भी ग़ैर जान के पत्थर उठा लिए
कालिख बना नक़ाब के क़ाबिल कभी कभी
दिल चाहता है काट दूँ उस की ज़बान को
देता है ऐसे ऐसे दलाइल कभी कभी
मुझ को तो मिल सका न मेरे जैसा कोई और
बैठा है आइना भी मुक़ाबिल कभी कभी
सूरज को देखने का हुनर आप में नहीं
बीनाई छीन लेती है मंज़िल कभी कभी
'सय्यद' दुआएँ बारिशें बन कर बरस रहीं
बाग़-ए-जिनाँ से आया है बिस्मिल कभी कभी















