'अजब उसूल 'अजब ही निज़ाम लिक्खा था
फ़िराक़-ए-यार को हमने दवाम लिक्खा था
ब-सद खुलूस ब-सद एहतराम लिक्खा था
जबीन-ए-चश्म पे अश्कों से नाम लिक्खा था
सुबूत माँग रहे हो कि कितना याद आए
तुम्हारी याद में ही हर कलाम लिक्खा था
ख़ुदा ने अपनी रज़ा से हमारी क़िस्मत में
तुम्हारे दिल में हमारा क़याम लिक्खा था
समझ रहे थे जवाँ इनको मयकशी का मक़ाम
तुम्हारी आँखों को बस यूँँ हराम लिक्खा था
तुम्हें डराए न तन्हाई इसलिए 'आफ़ी'
तुम्हारे वास्ते ख़त सुब्ह-ओ-शाम लिक्खा था
As you were reading Shayari by Aafreen Faheem
our suggestion based on Aafreen Faheem
As you were reading undefined Shayari