तमाम शिकवे गले मिल के भूल जाऊँ अभी
मैं चाहती हूँ गले से तुझे लगाऊँ अभी
हजार ग़म सहे सीने के क़ैद-ख़ाने में
मगर तकाज़ा-ए-उल्फ़त है मुस्कुराऊँ अभी
बहुत उदास हूँ लेकिन ये दिल की हसरत है
कि तेरी याद के दरिया में डूब जाऊँ अभी
सहर का वक़्त है और नींद भी नहीं आती
तो क्यूँ न तेरी ग़ज़ल कोई गुनगुनाऊँ अभी
किसी तरह तू मेरे पास लौट कर आ जा
मैं कितना तड़पी हूँ तेरे लिए बताऊँ अभी
ये सोच कर ही बताया है हाल-ए-दिल मैंने
कि अपने आप ही कितना फ़रेब खाऊँ अभी
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