'इश्क़ की जागीर दिलबर के सिवा कुछ भी नहीं
इस वफ़ा के दाम में मुझको मिला कुछ भी नहीं
अब भी वो मिलता है तो पहचान लेता है मुझे
देखता रहता है लेकिन बोलता कुछ भी नहीं
धूप की किरणों ने शब चेहरे पे बोसा ले लिया
रात को सोई कि जागी मैं पता कुछ भी नहीं
आबला-पा हूँ तमन्नाओं के सहरा में मगर
मेरी हिम्मत के लिए ये आबला कुछ भी नहीं
इस दिल-ए-सदचाक का इल्ज़ाम उसके सर हो क्यूँँ
वो है थोड़ा बेवफ़ा इस के सिवा कुछ भी नहीं
Read Full