कुछ आँसुओं के दाग़ भी हैं ख़ुश्बुओं के साथ
सब कुछ रखा सँभाल के तेरे ख़तों के साथ
डूबा हूँ तेरी याद के सागर में जब कभी
उभरा तिरा ख़याल नए पहलुओं के साथ
रस्म-ए-तकल्लुफ़ात न हम सेे निबाहिए
ऐसी भी क्या अदा कि मिलों दूरियों के साथ
बदला है वक़्त ख़ुद को भी नासेह बदल ज़रा
कब तक सुनेंगे तुझको उन्हीं मशवरों के साथ
बेजान वो ही आज ज़मीं पर पड़े हुए
नापे थे आसमान कई जिन परों के साथ
दीवारें पत्थरों की हैं शीशे जड़ी हुई
शीशों की 'उम्र कट रही है पत्थरों के साथ
बस देखते ही आपने तो फेर ली नज़र
हम कब से जी रहे हैं इन्हीं मंज़रों के साथ
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