musaahibon se kaho aaj ek kaam karen | मुसाहिबों से कहो आज एक काम करें

  - Dharmesh bashar

मुसाहिबों से कहो आज एक काम करें
जो जाम तल्ख़-तरीं है वो मेरे नाम करें

ये ज़िन्दगी कभी रोते कभी सिसकते कटी
जो बच रही है उसे क्यूँँ न वक़्फ़-ए-जाम करें

हमारा क़िस्सा-ए-ग़म इक अजीब क़िस्सा है
कहाँ से बात को छेड़ें कहाँ तमाम करें

अज़ीज़ थे कि अक़ारिब बिछड़ गए कब के
किसे गले से लगाएँ किसे सलाम करें

हैं छूटे दैर-ओ-हरम तो यही रवा है कि अब
पकड़ के हाथ में तसबीह राम राम करें

मैं आदमी हूँ ख़ुदाई का इक करिश्मा हूँ
फ़रिश्ते आएँ और आकर मुझे सलाम करें

वो लोग जिनसे मिरी रोज़-ओ-शब की निस्बत थी
मिरा नहीं तो मिरे फ़न का एहतिराम करें

तिरे 'बशर' से जो भी बन पड़ा वो कर गुज़रा
चलो अब उसके जनाज़े का एहतिमाम करें

  - Dharmesh bashar

More by Dharmesh bashar

As you were reading Shayari by Dharmesh bashar

Similar Writers

our suggestion based on Dharmesh bashar

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari