मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है
बिखरता फूल हूँ मुझ को हवा से चोट लगती है
मेरी आँखों में आँसू की तरह इक रात आ जाओ
तकल्लुफ़ से बनावट से अदास चोट लगती है
मैं शबनम की ज़बाँ से फूल की आवाज़ सुनता हूँ
'अजब एहसास है अपनी सदास चोट लगती है
तुझे ख़ुद अपनी मजबूरी का अंदाज़ा नहीं शायद
न कर अह्द-ए-वफ़ा अह्द-ए-वफ़ा से चोट लगती है
As you were reading Shayari by Bashir Badr
our suggestion based on Bashir Badr
As you were reading undefined Shayari