हिज्र में भी इश्क़ तुम से ही करना है

पास मेरे अपनी यादों का गहना है

आशिक़ों का मुख़्तलिफ़ होना पुर-ज़रूर
हम तिरे दिल में नहीं तो क्यूँ रहना है

ज़िंदगी में ज़ख़्म मैं ने बिस्यार पाए
अब मिरे हर ज़ख़्म को तुम को सहना है

ये मिरे ज़ख़्म-ए-ज़माना उम्र-ए-अबद
तेरे ही यादों में मुझ को ही डहना है

इस जहाँ को अपना माना ग़लती तिरी
ख़ुद बचा ले जाँ भँवर अब तो मरना है

— Bhanwar Mandan

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