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क़लाई

qalaai • کلائی

कलाई

wrist

کلائی

Unknown

कहूँ क्या हाल तेरी बे-वफ़ाई का
तनिक भी ग़म नहीं मुझ सेे ज़ुदाई का

दिया था माँ ने जो तुझ को बहू कह कर
कहाँ है यार वो कंगन कलाई का

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बात ही कब किसी की मानी है
अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी

ये कलाई ये जिस्म और ये कमर
तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी

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भले ही सैकड़ों मजबूरियाँ हों बेवफ़ाई की
मगर तुम वज्ह मत बनना किसी सूनी कलाई की

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बता रहा है झटकना तेरी कलाई का
ज़रा भी रंज नहीं है तुझे जुदाई का

मैं ज़िंदगी को खुले दिल से खर्च करता था
हिसाब देना पड़ा मुझ को पाई-पाई का

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पिछले बरस भी हम ने कलाई सजाई थी
राखी के धागे आज भी कच्चे नहीं पड़े

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सोचता हूँ वक़्त की तस्वीर जब मुझ सेे बनेगी
तो भला उस की कलाई पर घड़ी कैसी लगेगी

चाय उस से पूछ तो सकता हूँ मैं भी दोस्त,लेकिन
सोचता हूँ कौन सा वो कहने भर से चल पड़ेगी

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मिरी बहनों से मिलना तो उन्हें पैग़ाम ये देना
कि भाई अब नहीं तो क्या ख़ुदाई तो सलामत है

हुआ क्या जो के दुश्मन ने किया धड़ से अलग सर को
लो बाँधो राखियाँ इस
में कलाई तो सलामत है

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कभी कभी सभी त्यौहार याद आते हैं
तेरे बगैर कलाई उदास करती है

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यहाँ फौलाद सी मजबूत होती है कलाई
अगर हैं साथ में साहब बड़े दो, चार भाई

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तुम्हारा दिल नहीं तोडूँगी जानी
मगर तुम को नहीं छोडूँगी जानी

मोहब्बत में हुआ है जो हुआ है
कलाई अब नहीं मोडूँगी जानी

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कहूँ क्या हाल तेरी बे-वफ़ाई का
तनिक भी ग़म नहीं मुझ सेे ज़ुदाई का

दिया था माँ ने जो तुझ को बहू कह कर
कहाँ है यार वो कंगन कलाई का

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बात ही कब किसी की मानी है
अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी

ये कलाई ये जिस्म और ये कमर
तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी

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कलाई, जो कलाई है, अनुग्रह और असुरक्षा का प्रतीक है। कविता में, यह अक्सर मानव संबंधों की नाजुकता और वादों और बंधनों की कोमल प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है।

कवि कलाई का उपयोग कोमलता और अंतरंगता की छवियों को उभारने के लिए करते हैं। यह प्रेमी के कोमल स्पर्श या मित्रता के बंधनों का प्रतीक हो सकता है। कलाई समय के प्रवाह का भी रूपक हो सकती है, क्योंकि यह घड़ियों और कंगनों का भार वहन करती है।

कलाई मानव नाजुकता और संबंध की भावना को पकड़ती है। यह हमारे बंधनों की सुंदरता और क्षणभंगुरता की याद दिलाती है।