काम आती नहीं दवा कोई
रोज़ देता है बद-दुआ कोई
ख़ाली कमरे में ऐसे लगता है
दे रहा है मुझे सदा कोई
कौन है उस तरफ़ कोई भी नहीं
मुझ को ऐसा लगा कि था कोई
मुझ को डर है न पूछ ले मुझ से
है भला शहर में तेरा कोई
कॉल करने का उस को जब सोचूंँ
याद आता है वास्ता कोई
दिल मकाँ है ये जैसे मुफ़्लिस का
तोड़ जाता है बारहा कोई
— Dipendra Singh 'Raaz'















