काम आती नहीं दवा कोई
रोज़ देता है बद्दुआ कोई
ख़ाली कमरे में ऐसे लगता है
दे रहा है मुझे सदा कोई
कौन है उस तरफ़ कोई भी नहीं
मुझको ऐसा लगा कि था कोई
मुझको डर है न पूछ ले मुझ सेे
है भला शहर में तेरा कोई
कॉल करने का उसको जब सोचूंँ
याद आता है वास्ता कोई
दिल मकाँँ है ये जैसे मुफ़्लिस का
तोड़ जाता है बारहा कोई
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