naqsh-e-paa yaa to kisi ke kabhi dikhte hi nahin | नक़्श-ए-पा याँ तो किसी के कभी दिखते ही नहीं

  - divya 'sabaa'

नक़्श-ए-पा याँ तो किसी के कभी दिखते ही नहीं
गुज़रे भी क्यूँँ कोई याँ पेड़ पे पत्ते ही नहीं

लफ़्ज़ ऐसे हैं कि काग़ज़ पे ठहरते ही नहीं
ये फिसलते हैं उलझते हैं सँभलते ही नहीं

इस समंदर में सफ़र इस का है कब से जारी
ये क़दम क्यूँँ किसी साहिल पे ठहरते ही नहीं

उसने माँगा था किसी रोज़ घटा से तोहफ़ा
अब्र के टुकड़े हैं मिज़गाँ पे बरसते ही नहीं

पहले होता था बहुत दर्द नहीं होता अब
ऐसे ख़ंजर हैं कलेजे में उतरते ही नहीं

कब न तूफ़ाँ से घिरा था ये जज़ीरा उस का
शाख़ पर पत्ते हैं ऐसे कि लरज़ते ही नहीं

इक दहकता हुआ सूरज है निगाहों में 'सबा'
तपते सहारा में भी ये पाँव झुलसते ही नहीं

  - divya 'sabaa'

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