सड़क के दोनों तरफ़ कैमरे लगा के मुझे
ये कौन ढूँढता फिरता है अब गँवा के मुझे
बता तो दूँ तुझे लेकिन बयाँ से बाहर है
जो बात उसने बताई नहीं बता के मुझे
ये बात मुझ को भी मालूम थी मगर चुप था
वो रो रही थी किसी को गले लगा के मुझे
बता कि तूने भी उन से सबक़ लिया कि नहीं
ये तू जो क़िस्से सुनाता है कर्बला के मुझे
अगर ये सच है मिरा और ख़ुदा का मसअला है
तो पेश कीजिए फिर सामने ख़ुदा के मुझे
ये इंकिशाफ़ भी तफ़तीश में हुआ 'आमी'
किसी को तोड़ने वाली थी वो बना के मुझे
As you were reading Shayari by Imran Aami
our suggestion based on Imran Aami
As you were reading undefined Shayari