zakham ab tak vahii seene men li.e firta hooñ | ज़ख़्म अब तक वही सीने में लिए फिरता हूँ

  - Imran Aami

ज़ख़्म अब तक वही सीने में लिए फिरता हूँ
कूफ़े वालों को मदीने में लिए फिरता हूँ

जाने कब किस की ज़रूरत मुझे पड़ जाए कहाँ
आग और ख़ाक सफ़ीने में लिए फिरता हूँ

रेत की तरह फिसलते हैं मिरी आँखों से
ख़्वाब ऐसे भी ख़ज़ीने में लिए फिरता हूँ

एक नाकाम मोहब्बत मिरा सरमाया है
और क्या ख़ाक दफ़ीने में लिए फिरता हूँ

दिल पे लिक्खा है किसी और परी-ज़ाद का नाम
नक़्श इक और नगीने में लिए फिरता हूँ

इस लिए सब से अलग है मिरी ख़ुशबू 'आमी'
मुश्क-ए-मज़दूर पसीने में लिए फिरता हूँ

  - Imran Aami

Valentine Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Imran Aami

As you were reading Shayari by Imran Aami

Similar Writers

our suggestion based on Imran Aami

Similar Moods

As you were reading Valentine Shayari Shayari