ये मयकशों का तवाज़ुन भी क्या तवाज़ुन हैखड़े भी रहना सहूलत से लड़खड़ाना भीहमारे शहर के लोगों को ख़ूब आता हैकिसी को सर पे बिठाना भी और गिराना भी— Imran Aami