मुहब्बत से कभी जिसने चढ़ाई सीढ़ियाँ मुझको
वफ़ा के नाम पर दे दी उसी ने बेड़ियाँ मुझको
हुआ ऐसा मेरी ख़ातिर कोई पंखे से लटका था
रुलाती आज भी देखो उसी की सिसकियाँ मुझको
जहाँ पर फूल खिलते थे बहारें साथ गाती थीं
चिढ़ातीं आज देखो बाग़ की वो तितलियाँ मुझको
रखा सर गोद में माँ की तो सारी रात सोया हूँ
सुनाई दे रही हैं ये किसी की लोरियाँ मुझको
हुआ अर्सा कि सोया ही नहीं हूँ याद में तेरी
खिलाई जा रही हैं नींद की ये गोलियाँ मुझको
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