करना क़िस्सा मेरा तमाम है क्या
कोई ऐसा भी इंतिज़ाम है क्या
दोस्ती कैसी अजनबी थे अभी
ये बता मुझ सेे कोई काम है क्या
मेरे शे'रों पे थोड़ी दाद भी दो
दूर से ही दु'आ सलाम है क्या
पल गुज़रते नहीं सुकून से अब
उसके हाथों मेरी लगाम है क्या
आती मुझको नहीं पसंद कोई
दिल उसी का ही अब ग़ुलाम है क्या
क्यूँ न हो अब अयोध्या काशी
कोई मुग़लों का अब निज़ाम है क्या
गर हो लिखते तो ये भी याद रखो
कुछ भी लिखना कोई कलाम है क्या
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