karna qissa meraa tamaam hai kya | करना क़िस्सा मेरा तमाम है क्या

  - 'June' Sahab Barelvi

करना क़िस्सा मेरा तमाम है क्या
कोई ऐसा भी इंतिज़ाम है क्या

दोस्ती कैसी अजनबी थे अभी
ये बता मुझ सेे कोई काम है क्या

मेरे शे'रों पे थोड़ी दाद भी दो
दूर से ही दु'आ सलाम है क्या

पल गुज़रते नहीं सुकून से अब
उसके हाथों मेरी लगाम है क्या

आती मुझको नहीं पसंद कोई
दिल उसी का ही अब ग़ुलाम है क्या

क्यूँ न हो अब अयोध्या काशी
कोई मुग़लों का अब निज़ाम है क्या

गर हो लिखते तो ये भी याद रखो
कुछ भी लिखना कोई कलाम है क्या

  - 'June' Sahab Barelvi

Kahani Shayari

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