उफ़ ये अदाएँ उफ़ ये नख़रे तुम तो क़यामत ढाती हो
लेकिन ये बतलाओ जानाँ अब किस को बहलाती हो
गर ये इजाज़त मुझ को हो तो मैं एक और सवाल करूँँ
रात गए तुम अपने घर अब तो जल्दी आ जाती हो
तुम तो मुझ पर शक़ करते हो ख़ाला का फोन आया था
झूटा-सच्चा ही कुछ कह कर उस को भी समझाती हो
तीर चलाए थे जो तुमने अपनी अदाओं के मुझ पर
तीर-अंदाज़ी और ये कर्तब उस को भी दिखलाती हो
उस ने तो बस जिस्म लिया है दिल तो अब भी तुम्हारा है
इन बातों से दिल दुखता है ये सब क्यूँँ दोहराती हो
सारी बातें अपनी जगह हैं लेकिन मैं इक बात कहूँ
आँखें मेरी भर आती हैं जब जब तुम याद आती हो
अब तक बस ये बात न बदली मेरी जान-ए-जाँ तुम में
जब भी 'जून' का नाम लबों पर लाती हो शरमाती हो
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