तिरे आते ही ख़ुशबू लिख दी मैंने
उठाया पेन हर-सू लिख दी मैंने
ग़ज़ल में इक जगह पर मैं लिखा था
हटाकर उसको फिर तू लिख दी मैंने
यक़ीनन सर तो सीने पर रखा था
बहुत सोचा तो बाज़ू लिख दी मैंने
था लिखना तुमको इक अल्फ़ाज़ में ही
हसीं तुम थी सो महरू लिख दी मैंने
हक़ीक़त में तो मैं था उसके क़ाबू
ग़ज़ल में अपने क़ाबू लिख दी मैंने
उधर मैदान में ज़मज़म जनेऊ
इधर हिंदी में उर्दू लिख दी मैंने
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