खुल चुकी है आँख लेकिन मैं अभी सपने में हूँ

पाँव सहरा में हैं मैं अब भी तेरे कमरे में हूँ

फूल कहते हैं कि वो काँटों में भी महफ़ूज़ हैं
और इक तितली है जो कहती है मैं ख़तरे में हूँ

हिज्र का मौसम नहीं पर वस्ल भी हासिल कहाँ
सामने बैठा है वो और मैं अभी ख़दशे में हूँ

वक़्त बीता जा रहा है और मुसीबत सर पे है
वो वहाँ बेसुध पड़ा है और मैं रस्ते में हूँ

इक समुंदर कश्तियों को थाम कर बैठा रहा
मौज इक कहती रही मैं वक़्त के कहने में हूँ

तुम सहर कब से मुझे अपना सगा कहने लगे
तुम तो कहते थे कि मैं इक दूर के रिश्ते में हूँ

— Karan Sahar

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