वस्ल की बात ही नहीं होती
इस तरह आशिक़ी नहीं होती
आग ख़ुद को लगाए बैठा हूँ
फिर भी क्यूँ रौशनी नहीं होती
हिज्र में ही तो ये सहूलत है
वस्ल में शा'इरी नहीं होती
— Karan Sahar
इस तरह आशिक़ी नहीं होती
आग ख़ुद को लगाए बैठा हूँ
फिर भी क्यूँ रौशनी नहीं होती
हिज्र में ही तो ये सहूलत है
वस्ल में शा'इरी नहीं होती
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