ग़ुबार होने लगीं ज़िंदगी में सब चीज़ें
ये मेरा वहम है या वाक़'ई में सब चीज़ें
किसी भी चीज़ से इस में कमी नहीं आती
इज़ाफ़ा करती हैं तेरी कमी में सब चीज़ें
ये इंकिशाफ़ हुआ है अँधेरा बढ़ने से
दिखाई देती नहीं रौशनी में सब चीज़ें
निकल रहा था मैं घर से तो कल नज़र आईं
ग़ुरूब होती हुई उस गली में सब चीज़ें
यही ग़ियाब में मेरे कलाम करती हैं
जो चुप हैं अब मेरी मौजूदगी में सब चीज़ें
वो वक़्त बीत चुका अब अजीब लगती हैं
पसंद आती रहीं जो ख़ुशी में सब चीज़ें
मैं किस तरह से तुम्हारी सदा पे रुक जाऊँ
कि चल रही हैं मेरी हमरही में सब चीज़ें
मेरे बदलने से ये इंक़लाब आया है
बदल गई हैं घड़ी दो घड़ी में सब चीज़ें
मगर ये शहर है 'काशिफ़-हुसैन' दश्त नहीं
रवा सही मियाँ दीवानगी में सब चीज़ें
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