हर एक मंज़र-ए-जाँ को बुझा के रख दिया है
कि हम ने ''इश्क़ मुक़ाबिल अना के रख दिया है
किसी तरफ़ भी मुझे देखने नहीं देता
इस आइने ने तो पत्थर बना के रख दिया है
बुरे दिनों में किसी रोज़ काम आएगा
सो अच्छे वक़्त में कुछ ज़ह्र ला के रख दिया है
वो एक फूल जो रक्खा था मैंने उस के लिए
उठाया उस ने मगर मुस्कुरा के रख दिया है
अजीब शोर था दीवार-ओ-दर भी काँप उठे
अजीब शोर था मुझ को हिला के रख दिया है
ख़ुदा का काम था ख़ल्क़-ए-ख़ुदास क्यूँ कहते
सो अपना मसअला आगे ख़ुदा के रख दिया है
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