इश्क़ बार-ए-दिगर हुआ ही नहीं
दिल लगाया था दिल लगा ही नहीं
एक से लोग एक सी बातें
घर बदलने का फ़ाएदा ही नहीं
हम जहाँ भी गए पलट आए
कोई तेरी तरह मिला ही नहीं
ढूँड लाते वहीं से दिल लेकिन
फिर वो मेला कहीं लगा ही नहीं
मैं ने अपना ही हाथ थाम लिया
और कोई क़रीब था ही नहीं
इस तरह टोकता हूँ औरों को
जैसे मैं झूट बोलता ही नहीं
— Liyaqat Ali Aasim














