मेहराब-ए-ख़ुश-क़याम से आगे निकल गई
वहशत दिए की शाम से आगे निकल गई
ख़ल्वत के फ़ासले से न बैठूँ तो क्या करूँँ
महफ़िल ही एहतिमाम से आगे निकल गई
फ़ारिग़ न जानिए मुझे मसरूफ़-ए-जंग हूँ
उस चुप से जो कलाम से आगे निकल गई
तुम साथ हो तो धूप का एहसास तक नहीं
ये दोपहर तो शाम से आगे निकल गई
जब मारका हुआ तो मेरी तेग़-ए-दर-गुज़र
शमशीर-ए-इंतिक़ाम से आगे निकल गई
मरने का कोई ख़ौफ़ न जीने की आरज़ू
क्या ज़िंदगी दवाम से आगे निकल गई
'आसिम' वो कोई दोस्त नहीं था जो ठहरता
दुनिया थी अपने काम से आगे निकल गई
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