छिपा हूँ क़र्ज़ के माफ़िक़ मैं इस ज़माने से
मगर मैं कितना बचूँगा नज़र चुराने से
उदास रहने की आदत है मेरी बचपन से
भरेगा ज़ख़्म मिरा पट्टियाँ हटाने से
मुझे लगी है परिंदों की बद-दुआ शायद
जला है घर मिरा वो इक शजर जलाने से
मैं इसलिए भी मोहब्बत से दूर रहता हूँ
ग़म-ए-हयात ही बढ़ता है दिल लगाने से
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
our suggestion based on Harsh Kumar Bhatnagar
As you were reading undefined Shayari