jab usne mere KHvaab ko miTTi banaa diya | जब उसने मेरे ख़्वाब को मिट्टी बना दिया

  - Harsh Kumar Bhatnagar

जब उसने मेरे ख़्वाब को मिट्टी बना दिया
मैंने भी अपनी आँख से दरिया बहा दिया

गिनवा रहा है ऐब वो दुनिया के सामने
हम ने भी ख़्वाह-म-ख़्वाह उसे सब कुछ बता दिया

ऐ काश ये हवाएँ ही अब तुझको ढूँढ़ लें
सहरा की रेत पर तिरा चेहरा बना दिया

अब आइने से पूछता हूँ रोज़ ये सवाल
मेरी हँसी को तूने कहाँ पर छिपा दिया

उसके लबों पे एक परत जम रखी है अब
ये गुल-ज़मीं को हिज्र ने बंजर बना दिया

बस इक ज़रा सी देर से दोनों बिछड़ गए
वो आख़िरी था मौक़ा जो मैंने गँवा दिया

शहरों में है घुटन भले पर ज़िंदगी है दोस्त
इक नौकरी ने हम को है जीना सिखा दिया

मैं आइने के पार उसे देखता हूँ रोज़
इक शख़्स जिस ने मुझ को है पत्थर बना दिया

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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