jaanta hooñ ye tire naqsh-e-kaf-e-paa nahin hai | जानता हूँ ये तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा नहीं है

  - Harsh Kumar Bhatnagar

जानता हूँ ये तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा नहीं है
इसलिए चुप हूँ कि तू मेरा असासा नहीं है

हम हैं मिट्टी की तरह इस में ही मिल जाएँगे
अब तलक जो है कमाया वो भी अपना नहीं है

पुतलियाँ ही हैं बनाई हुई उस रब की हम
कोई मंदिर कोई मस्जिद कोई गिरजा नहीं है

वक़्त के साथ बदल जाता है सब कुछ लेकिन
गाँव का एक मकाँ आज भी बदला नहीं है

मैंने पहले ही कहा था कि मोहब्बत के बाद
दिल तो क्या चीज़ है इंसान भी बचता नहीं है

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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