मैं क्या बताऊँ कि क्या चल रहा है अरसे से
हमारे बीच में कोई ख़फ़ा है अरसे से
मैं आना चाहता हूँ लौट कर के घर अपने
मगर ये पाँव में इक आबला है अरसे से
मैं ना-ख़ुदा के सभी रंज-ओ-ग़म से वाक़िफ़ हूँ
वो भी तो साथ मिरे बह रहा है अरसे से
किसी भी तौर ये आँसू निकल नहीं सकता
ये मेरी आँख में सूखा पड़ा है अरसे से
मैं आँख मीच के बे-फ़िक्र हो के सो जाऊँ
वो माँ की गोद मगर लापता है अरसे से
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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