मैं तेरा इश्क़ लिक्खूँ या लिखूँ अंजाम मतले में
वो पहला वस्ल लिक्खूँ या अधूरी शाम मतले में
मैं अपने वसवसों के बारे क्या लिखता ग़ज़ल में दोस्त
मुझे डर था कि हो जाऊँगा मैं नाकाम मतले में
तिरी हिजरत के शे'रों ने बचाया है मुझे वर्ना
मैं अपने सर ही ले बैठा था इक इल्ज़ाम मतले में
ख़बर होती अगर सब को तू कितनी ख़ूब-सूरत है
कोई करता नहीं तुझको कभी बद-नाम मतले में
ग़ज़ल की शक्ल में उसका हसीं चेहरा बनाता हूँ
कभी भी ले नहीं पाता मैं उसका नाम मतले में
बड़ा मुश्किल है मतले में ही महफ़िल लूटना या रब
सिवाए इश्क़ के भी होता है कोहराम मतले में
है पहिया ज़िंदगी का सिर्फ़ उसके हाथ में तेरा
मुकम्मल चाहता है सब तो लिख श्री राम मतले में
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