musalsal door udne ka parinda hi hunar rakhta | मुसलसल दूर उड़ने का परिंदा ही हुनर रखता

  - Manohar Shimpi

मुसलसल दूर उड़ने का परिंदा ही हुनर रखता
ज़मीं से अब्र छूने का बड़ा गहरा जिगर रखता

हमेशा साथ चलने पर यक़ीं करता रहा हूँ मैं
सफ़र में कारवाँ चलते सभी की फिर ख़बर रखता

ख़ुदा अक्सर मुझे छोटे ही बच्चों में नज़र आता
कहाँ हैं इल्म उन सबको ख़ुदा उनकी ख़बर रखता

किसानों की कहाँ दिक़्क़त समझता हैं कोई नेता
सियासत वोट की करके सभी पर वो नज़र रखता

मुसाफ़िर हूँ हमेशा ही सफ़र में रोज़ मैं चलता
सफ़र में ख़ार रह रह कर चुभे तो पा किधर रखता

'मनोहर' अस्ल में वो ही अगर साया बनी होती
बिठा के रोज़ पलकों पर उसे शाम-ओ-सहर रखता

  - Manohar Shimpi

More by Manohar Shimpi

As you were reading Shayari by Manohar Shimpi

Similar Writers

our suggestion based on Manohar Shimpi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari