रह-ए-उल्फ़त हमेशा सच बताए तो हिमाक़त है
सदाक़त की कहाँ देखी किसी ने कोई मूरत है
फ़ज़ा की गर्द में भी तो फ़रोग़-ए-हुस्न दिखता है
बयारों से कभी पूछो वो कितनी ख़ूबसूरत है
जहाँ इंसानियत है ही नहीं दुश्वार जीना है
हिसाब-ए-दर्द होता है वहाँ कैसे हुकूमत है
ख़ुदा देता ब-ख़ूबी ही दुआओं से सभी को ही
अगर है अम्न लोगों में तभी दिखती वो बरकत है
कभी भी मस'अला गहरा रहा तब बे-सहारा था
'मनोहर' साथ साया भी न दे तो फिर मुसीबत है
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