तुझे आसमाँ में न हम देखते हैं
ज़मीं पर कहीं क्यूँ सितम देखते हैं
ज़मीं पर करिश्में कहीं देखते हैं
उसी में कभी हम मनम देखते हैं
फ़िज़ाएँ अदाएँ सभी देखते हैं
निगाह-ए-करम फिर सनम देखते हैं
किसी काम से क्यूँ किसे सोचते हैं
ग़लत सोच से हम भरम देखते हैं
हमेशा सफ़र में तुझे याद करते
तुझे सोच के फिर करम देखते हैं
सफ़र में अकेले हमीं तो चले हैं
हमारे न नक़्शे क़दम देखते हैं
तरक्की हमीं जब कभी देखते हैं
ख़ुशी से उसी में करम देखते हैं
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