मुद्दतों बाद जब भी ख़ूब देखूंँगा
देखके क्यूँँ उसे गहरा न सोचूंँगा
याद आती रही है वो बहुत लेकिन
राज़ दिल का उसे कोई न बोलूंँगा
फ़ैसले पर नदामत ही नहीं मुझको
ज़िक्र उसका हुआ था ये न बोलूंँगा
सिर्फ़ तेरे बिना तन्हा जिया कैसे
ज़ुल्म ऐसा कभी फिर मैं न झेलूंँगा
ज़ेहन में हैं वही यादें अभी वैसे
बोलकर क्यूँ उसे ऐसे न खो दूंँगा
जब 'मनोहर' कभी रंजिश न थी दिल में
साथ उसका मिला है ख़ूब बोलूंँगा
Read Full