चाहना दिल से ज़िंदगी होती
ख़ूबसूरत वो आशिक़ी होती
बे-मुरव्वत जिधर कहीं भी हो
सिर्फ़ उन सेे ही बे-रुख़ी होती
बहर दिल से लबों पे जब आती
लुत्फ़ में फिर कहाँ कमी होती
जंग लड़ना कहाँ रहे आसाँ
फ़त्ह करना शनावरी होती
जब किसी की कमी बहुत होती
फिर तभी आँख में नमी होती
'इश्क़ में जो नसीब से मिलता
वो ख़ुदा की गदागरी होती
ख़्वाहिशें और भी 'मनोहर' है
मिल जो जाए वो ज़िंदगी होती
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