घनी ज़ुल्फ़ों से तेरे हो गई ये शाम अब कैसे
तुझे फिर देख के दिन में करेंगे काम अब कैसे
मशक़्क़त से अगर मिलती सही में कामयाबी तो
किसे भी कोई फिर क्यों ही करें बदनाम अब कैसे
निगाहें खींच लाए जब लब-ओ-रुख़्सार तक तेरे
शराब-ए-नाब आँखें हो तो फिर जाम अब कैसे
मुहब्बत इश्क़ में जब भी भरोसा टूटता तो फिर
कहेंगे इश्क़ की मंजिल हुई नीलाम अब कैसे
दुआ माँ-बाप की लो फिर करो तुम बंदगी वर्ना
मिलेंगे इस जहाँ में ही हमें श्री राम अब कैसे
'मनोहर' ज़िंदगी के इस सफ़र में जो मिले साथी
वो आहिस्ता ही आहिस्ता हुए गुमनाम अब कैसे
Read Full