कैसे आब-ए-तल्ख़ बहते थे न जाने मेरे ही
अश्क़ से अब याद आते है ज़माने मेरे ही
देख के रख़्त-ए-सफ़र ही दर्द होता क्यूँँ मुझे
साथ लेकिन है दिया अहद-ए-वफ़ा ने मेरे ही
एक तिनका हूँ हवा से ही कहीं उड़ता रहूँ
आज है कल के कहाँ है फिर ठिकाने मेरे ही
इस जहाँ में अजनबी सा ही लगे है अब मुझे
क्यूँ किया बे-दख़्ल मुझको फिर ख़ुदा ने मेरे ही
काश कोई बात तो सुनता 'मनोहर' वो कभी
फिर तह-ए-दिल से पुकारा है वफ़ा ने मेरे ही
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