देखते थे तुझे ही रोज़ सहर होते ही
ज़ेहन में आन बसी तेरी ख़बर होते ही
मुब्तसिम ख़ूब लगे है वो हसीं सा चहरा
देख के फिर न रुके एक नज़र होते ही
रात में रंग नए ख़ूब दिखाते कितने
शम्अ-ए-रौशन न हुई सर्द सहर होते ही
एक अंगार जो बरसों न बुझी अंदर से
जीतना अब तुझे है यार शरर होते ही
मंज़िलें सर न हुईं तेरे बिना ही हमदम
मरहले छूट गए एक सफ़र होते ही
ख़ूबसूरत से हसीं पल जो बिताए हमने
याद आते न 'मनोहर' वो सहर होते ही
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