कर लिया 'इश्क़ माह-पारे से
हम को मतलब नहीं ख़सारे से
दिन तो कट जाए तेरी फ़ुर्क़त में
शब गुज़रती नहीं गुज़ारे से
पहले सुन लेता था ख़मोशी भी
अब जो सुनता नहीं पुकारे से
फिर न कहियो कि भूल जाएँ तुम्हें
हो नहीं पाएगा हमारे से
कब नहीं माँगा है तुझे रब से
और फिर टूटते सितारे से
कर गईं वो नशा तिरी आँखें
जो उतरता नहीं उतारे से
इक इशारे ने की है वो हालत
बच के चलते हैं हर इशारे से
बैठ शब सोचता रहा तुझ को
लग के दीवार के सहारे से
मुन्तज़िर कब से तेरी आमद के
नैनाँ बैठे हुए हैं हारे से
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