ग़मों का इक फ़साना बन गए हैं
मोहब्बत का निशाना बन गए हैं
हमीं ने क़ैद ख़ुद को कर रखा है
हमीं ख़ुद क़ैद-ख़ाना बन गए हैं
न हरगिज़ इश्क़ में बनना था पागल
मगर हम अहमक़ाना बन गए हैं
अदा उस की भी थी कुछ काफ़िराना
सो कुछ हम शाइ'राना बन गए हैं
अता कर मुझ को दर-बदरी वो 'क़ैसर'
किसी का आशियाना बन गए हैं
— Meem Maroof Ashraf















