ऐ मेरी ज़िंदगी ऐ मेरी हम-नवा तू कहाँ रह गई मैं कहाँ आ गया

कुछ न अपनी ख़बर कुछ न तेरा पता तू कहाँ रह गया मैं कहाँ आ गया

सब्ज़ शाख़ों से गुल यूँही चुनना कभी गुल से गुलज़ार के ख़्वाब बुनना कभी
फ़ुर्सत-ए-इब्तिदा हसरत-ए-इंतिहा तू कहाँ रह गई मैं कहाँ आ गया

— Naseer Turabi

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