khatm hota hai museebat ka ye safar hi nahin | ख़त्म होता है मुसीबत का ये सफ़र ही नहीं

  - Nityanand Vajpayee

ख़त्म होता है मुसीबत का ये सफ़र ही नहीं
और मंज़िल भी कहीं आ रही नज़र ही नहीं

जिस
में उड़ते हों परिंदे बग़ैर फ़िक्र किए
ऐसा तो दिखता मुझे आसमाँ किधर ही नहीं

दूरबीं से मैं जहाँ ज़ूम कर के देख चुका
अब किसी चोर में हाकिम का कोई डर ही नहीं

लड़कियाँ खुल के निकल पाएँ और न घबराएँ
मेरी नज़रों में अभी आई वो डगर ही नहीं

कौन कहता है कि दिन अच्छे आ गए हैं यहाँ
काला धन आया अभी तक तो लौटकर ही नहीं

लाखों मुफ़लिस जो हैं फुटपाथों पर बिलखते हुए
अब तलक उनको दिलाया किसी ने घर ही नहीं

खेत में घूम रहे काश्तकार टॉर्च लिए
रात दिन एक किए बिन तो है गुज़र ही नहीं

मैं गला फाड़ के चिल्ला चुका मदद कर दो
उनके कानों पे मेरी टेर का असर ही नहीं

भुख़मरी और है ऊपर से धूर्त महँगाई
डायनें दिन में भी ठाढ़ी हैं रात भर ही नहीं

  - Nityanand Vajpayee

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