ye ashk jo bahte hain teri aankhoñ se dhalkar | ये अश्क जो बहते हैं तेरी आँखों से ढलकर

  - Nityanand Vajpayee

ये अश्क जो बहते हैं तेरी आँखों से ढलकर
लाएँगे सुनामी ये मेरे दिल में ख़लल कर

फुटपाथों पे सोते हैं बिना छत के जो बच्चे
तक़दीर उन्हें दूर से हँसती है चुहल कर

झुक झुक के सलामी जो लगाते थे वही अब
जूतों को किसी पर भी चलाते हैं उछल कर

तासीर भला प्यार की समझेंगे कहाँ वो
दिल को जो गए मेरे हैं पैरों से कुचल कर

खारा है समंदर का वजूद उनको पता था
पर प्यास के मारे थे गए दूर से चल कर

मतलब के लिए लोग ज़माने में अमूमन
दुश्मन से भी मिल जाते हैं पाले को बदल कर

'उपमन्यु' जलाते हो जो दहलीज़ पे दीया
इस सेे भी जलें दिल तो उन्हें जाने दो जल कर

  - Nityanand Vajpayee

Kismat Shayari

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