वो जब से दिल में उतर गए हैं
हम और भी कुछ सँवर गए हैं
मिज़ाज में है अजीब शोख़ी
उसी में खो कर बिखर गए हैं
कली हज़ारों हैं गुलशनों में
मगर उन्हीं पर ठहर गए हैं
पढ़ा उन्होंने ख़याल मेरा
तो खिल के कितना निखर गए हैं
गुलाब की पंखुड़ी मुकम्मल
पे उनके कमसिन अधर गए हैं
वहीं हैं अब तक जहाँ मिले थे
इधर रुके हैं उधर गए हैं
है नित्य उनका इलाज ही क्या
जो मर गए या मुकर गए हैं
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